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Thursday, December 8, 2011

इस ख़वाहिश पे भी पहरेदार बैठे हैं

कुछ लोग सितम करने को तय्यार बैठे है
कुछ लोग मगर हम पे दिल हार बैठे हैं
इस कशमकश में पहचाने नहीं जाते
कहाँ दुश्मन और कहाँ दोस्त, यार बैठे हैं
इश्क को आग का दरिया ही समझ लीजिये हज़ूर !
कोई इस पार, तो कोई उस पार बैठे हैं
कौन कहता है, कि इस शहर में सारे है बेवफ़ा
हमारे सामने वफ़ादार, दो चार बैठे हैं
कल तक जिन्हें हसरत थी हमें बर्बाद करने की
आज वही लोग, अपने किये पे शर्मसार बैठे हैं
दुनिया से रूठ जाने की खवाहिश है हमारी
क्या करूँ, इस ख़वाहिश पे भी पहरेदार बैठे हैं !!

2 comments:

  1. बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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